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बृहत्संहिता • अध्याय 105 • श्लोक 8
अन्नैः क्षीरघृतोत्कटैः सह गुडैर्विप्रान् समभ्यर्चयेद् दद्यात् तेषु सुवर्णवखरजतं लावण्यमिच्छन्नरः । पादर्शात् प्रभृति क्रमादुपवसन्त्रङ्ग र्क्षनामस्वपि कुर्यात् केशवपूजनं स्वविधिना धिष्ण्यस्य पूजां तथा ॥
लावण्य की इच्छा करने वाले मनुष्य को चाहिये कि दूध, घृत और गुड़ से मिश्रित अन्नों से ब्राह्मणों की पूजा करे तथा उन ब्राह्मणों को सोना, वत्र और चाँदी प्रदान करें। पाँव के नक्षत्र से आरम्भ करके उपवास करता हुआ विष्णु और अंग के नक्षत्रों को पूजा करे ।
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