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बृहत्संहिता • अध्याय 105 • श्लोक 6
चैत्रस्य बहुलपक्षे ह्यष्टम्यां मूलसंयुते चन्द्रे । ह्युपवासः कर्तव्यो विष्णुं सम्पूज्य धिष्ण्यं च ॥
चैत्र शुक्ल अष्टमी में यदि मूल नक्षत्र और चन्द्रवार हो तो उस दिन विष्णु और नक्षत्र की पूजा करके प्रथम उपवास प्रारम्भ करके जैसे-जैसे रोहिणी आदि आता जाय वैसे-वैसे आर्दा तक उपवास करना चाहिये।
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