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अध्याय 10 — शृङ्गोन्नत्यधिकारः
सूर्य सिद्धांत
15 श्लोक • केवल अनुवाद
चन्द्रमा के भी उदय और अस्त का साधन पूर्वोक्त विधि से करना चाहिए। चन्द्रमा १२ अंशों (कालांशों) तक सूर्य से अन्तरित होकर पश्चिम में उदित और पूर्व दिशा में अस्त होता है।
शुक्लपक्ष में अभीष्टदिन में सूर्यास्तकाल के समय स्फुट सूर्य और चन्द्रमा का साधन कर चन्द्रमा में आयन और आक्षदृक्कर्म का संस्कार करें।
स्फुट सूर्य और चन्द्र में ६ राशि जोड़कर इनके अन्तरासुओं का साधन करना चाहिये।
सूर्यास्त के अनन्तर इन अन्तरासुओं के तुल्य रात्रि व्यतीत होने पर चन्द्रमा अस्त होता है।
भगणार्ध अर्थात् ६ राशि सूर्य में जोड़कर दूक्कर्मसंस्कृत केवल चन्द्र के अन्तरासुओं का साधन करना चाहिये इन्हीं अन्तरासुओं के तुल्य सूर्यास्त के अनन्तर कृष्ण॑पक्ष में चन्द्रमा उदित होता है।
सूर्य और चन्द्र की स्पष्टक्रान्तिज्याओं का एक दिशा में अन्तर तथा भिन्न दिशा में योग करने से सूर्य से, चन्द्रमा जिस दिशा में रहता है उस दिशा की ज्या होती है।
अर्थात् सूर्य से चन्द्र दक्षिण दिशा में हो तो दक्षिण तथा उत्तर दिशा में हो तो उत्तर ज्या भुज होता है। इस ज्या रूप भुज को चन्द्रच्छायाकर्ण से गुणाकर द्वादश गुणित अक्षज्या में, उत्तर भुज होने पर ऋण तथा दक्षिण भुज होने पर धन करने से जो शेष रहे उसमें स्वदेशीय लम्बज्या का भाग देने से भाग फल संस्कारोत्पन्न दिशा में भुज होता है।
द्वादशांगुल शंकु कोटि होती है। इन दोनों के वर्गयोग का वर्गमूल लेने से श्रृड़ोन्नति में कर्ण होता है।
सूर्य रहित चन्द्र की कला में ९०० का भाग देने से लब्धि चन्द्रमा का अड्गुलात्मक शुक्ल मान होता है। इसे अड्गुलात्मक चन्द्रबिम्ब से गुणा कर १२ से भाग देने पर प्राप्त लब्धि स्पष्ट शुक्लमान होता है।
समतल भूमि में दिकूसाधन कर दिक्सूत्र संपात में अर्क संज्ञक विन्दु बना कर वहाँ से अपनी दिशा में पूर्व साधित भुज के तुल्य रेखा करें। उस भुज के अग्र से पश्चिमाभिमुखी द्वादश अड्गुलात्मक कोटि का दान कर कोटि के अग्र से सूर्यसंज्ञक विन्दु पर्यन्त कर्ण के तुल्य रेखा करें।
कोटिकर्ण के योग विन्दु को केन्द्र मानकर तात्कालिक अंगुलात्मक चन्द्रबिम्ब व्यासार्द्ध से चन्द्रमण्डल बनाकर कर्णरेखा से दिकूसाधन करना चाहिए।
अर्थात् चन्द्रबिम्बपरिधि एवं कण्रिखा के योग को पूर्व तथा कर्ण रेखा को अपने मार्ग में बढ़ाने से दूसरे भाग में चन्द्र बिम्बपरिधि में जहाँ स्पर्श करे वहाँ पश्चिम दिशा कल्पना कर इनसे दक्षिण और उत्तर दिशा का साधन करना चाहिए। फिर चन्द्रबिम्बपरिधि और कण्रिखा के सम्पात विन्दु से कण्रिखा के मार्ग से चन्द्रबिम्ब केन्द्र की ओर पूर्व साधित शुक्ल अंकित कर शुक्लाग्र और दक्षिणोत्तर चिहनों से दो मत्स्य बनाकर
उनके मुखपुच्छगत रेखाओं के सम्पात विन्दु को केन्द्र मानकर शुक्लाग्र और दक्षिणोत्तर चिहनों को स्पर्श करते हुए चाप से निर्मित चन्द्रवृत्त क्षेत्रस्थ चापच्छेद से यहाँ जैसा दीखता है वैसा ही उस दिन आकाश में भी चन्द्रमण्डल दीखेगा।
चन्द्रमण्डल में कर्णरेखा की तरह कोटिरेखा से दिक्साधन कर कोटि को उन्नत “करके दक्षिणोत्तर रेखा के अन्त में अर्थात् दक्षिण दिशा की ओर अथवा उत्तर दिशा की ओर उन्नत श्रृंड़ को बनाने से आकाश में स्थित चन्द्रमा की दृश्य आकृति होती है।
कृष्णपक्ष में ६ राशियुत सूर्य को चन्द्रमा में घटाकर पूर्वोक्त प्रकार से असितमान का साधन करना चाहिए। यहाँ भुज का संस्कार विपरीत होता है तथा चन्द्रमण्डल के पश्चिम भाग में कृष्णमान का वृद्धि होती है।
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