मध्याहनेन्द्र॒प्रभाकर्णसड-गुणा यदि सोत्तरा ।
तदाऊक॑ध्नाक्षजीवायां शोध्या योज्या च दक्षिणा ॥ ७
अर्थात् सूर्य से चन्द्र दक्षिण दिशा में हो तो दक्षिण तथा उत्तर दिशा में हो तो उत्तर ज्या भुज होता है। इस ज्या रूप भुज को चन्द्रच्छायाकर्ण से गुणाकर द्वादश गुणित अक्षज्या में, उत्तर भुज होने पर ऋण तथा दक्षिण भुज होने पर धन करने से जो शेष रहे उसमें स्वदेशीय लम्बज्या का भाग देने से भाग फल संस्कारोत्पन्न दिशा में भुज होता है।
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