चन्द्रमण्डल में कर्णरेखा की तरह कोटिरेखा से दिक्साधन कर कोटि को उन्नत “करके दक्षिणोत्तर रेखा के अन्त में अर्थात् दक्षिण दिशा की ओर अथवा उत्तर दिशा की ओर उन्नत श्रृंड़ को बनाने से आकाश में स्थित चन्द्रमा की दृश्य आकृति होती है।
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