अर्थात् चन्द्रबिम्बपरिधि एवं कण्रिखा के योग को पूर्व तथा कर्ण रेखा को अपने मार्ग में बढ़ाने से दूसरे भाग में चन्द्र बिम्बपरिधि में जहाँ स्पर्श करे वहाँ पश्चिम दिशा कल्पना कर इनसे दक्षिण और उत्तर दिशा का साधन करना चाहिए। फिर चन्द्रबिम्बपरिधि और कण्रिखा के सम्पात विन्दु से कण्रिखा के मार्ग से चन्द्रबिम्ब केन्द्र की ओर पूर्व साधित शुक्ल अंकित कर शुक्लाग्र और दक्षिणोत्तर चिहनों से दो मत्स्य बनाकर
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