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अध्याय 4 — चतुर्थ अध्याय

शिवभारतम्
68 श्लोक • केवल अनुवाद
कविंद्र ने कहा - बाद में विठ्ठल राजा के खेलकर्ण प्रभृति अतुलनीय वीर पुत्रों के पक्षपाती स्वामी निजामशाह ने
बड़े परिवार वाले, विशाल सेना से युक्त, विपक्ष का नाश करने वाले, मानो वे साक्षात् इंद्र ही हो, ऐसे यादवराज अत्यंत अपराजेय है,
यह जानकर उसने अपने मन में एक महान धोखा देने की योजना बनाई।
उसके दुष्ट विचार को जानकर वह महाबलशाली कुलश्रेष्ठ यादवराज दिल्ली के सम्राट से जाकर मिल गया।
जब यादवराज ने निजामशाह का देश छोड़ा तो आदिलशाह इस अवसर को देखकर खुश हुआ।
क्योंकि पूर्व में जब निजामशाह से वह कदम कदम पर पराजित हुआ तो उसने स्वयं मुगल बादशाह से सन्धि की थी।
लंबे समय तक निजामशाह से ईर्ष्या करने वाला, उदार और गौरवशाली दिल्ली का बादशाह, आदिलशाह की इच्छा को पूरा करने के लिए शीघ्र ही तैयार हो गया।
शक्तिशाली मुगल बादशाह जहांगीर ने इब्राहिम आदिलशाह की मदद के लिए एक सेना भेजी।
मुगल सेना के आकर मिलते ही आदिलशाह को अपना शत्रु निजामशाह कपटी लगने लगा।
फिर शाहजी राजा, धनुर्धारी शरीफजी, बहादुर एवं मेधावी खेलकर्ण,
बलवान मल्लराव तथा मंबाजी राजा, हाथी के समान बलवान नागराज,
परशुराम, राजा त्र्यंबकराज, युद्ध में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध राजा कक्क,
शत्रुजेता हम्मीरराज, मुधोजी फलटणकर,
युद्ध के लिए उत्साहित निषाद, उनसे अन्य कई नृसिंहराज, बल्लाळ त्रिपद आदि सेनापति,
वैसे ही गौरवशाली विठ्ठलराज कांटे, दत्ताजी जगन्नाथ, यशस्वी मंबराजा
ब्राह्मण नंसिह पिंगले, जगदेव के पुत्र सुंदरराज,
अभिमानी सारथी याकुतखान, शूर, सुंदर और उग्रकर्मा मनसूरखान तथा
जोहरखान, अभिमानी हमीदखान, अग्नि के समान तेजस्वी वीर आतसखान,
सूर्य के समान तेजस्वी अंबरखान बर्बर, उनका पुत्र स्वाभिमानी फतेहखान,
आदमखान के यशस्वी पुत्र तथा अन्य बड़े बड़े सेना नायकों के द्वारा सभी ओर संरक्षित निजामशाह था।
ऐसी स्थिति में वह दुश्मन समूह का विनाशक, अपने बाहुबलियों के प्रति अभिमानी, आग की तरह प्रखर निजामशाह अपने दुश्मनों को तिनके के समान समझने लगा।
लेकिन आदिलशाह दिल्ली के बहाशाह की मदद के लिए निजामशाह के साथ युद्ध की तैयारी करने लगा।
जलालखान, जहानखान, खंजीरखान, सिकंदरखान, करमुल्लाखलेलखान, सुजानखान सामदखान,
ये सभी गौरवशाली मुसलमान बहादुर खान के साथ आए।
युद्धप्रिय दुदराज, क्षत्रकर्म के लिए प्रसिद्ध ब्राह्मण उदारराम, युद्ध में भारद्वाज जैसा शक्तिशाली दादा विश्वनाथ,
राघव, अचल, बहादुर जसवंत तथा यादवराज के सभी पुत्र और स्वयं बलवान यादवराज,
ये सभी लष्करखान सेनापति के साथ दिल्ली के बादशाह की आज्ञा से दक्षिण में प्राप्त हुए थे।
जैसे निर्बाध और शीघ्र गति वायु आकाश पर आक्रमण करती है, वैसे ही उस शक्तिशाली सेनापति ने निजाम के मुलूख पर आक्रमण कर दिया।
मुस्तफाखान, मसूदखान, फरादखान, दिलावरखान, सरजायाकुतखान, खैरतखान, अंबरखान,
अंकुशखान ये सभी मुसलमान और आदिलशाह के अतुल पराक्रमी कई अन्य मित्र और सेवक तथा
दुढिराज नाम का ब्राह्मण, उनकी जाति का रुस्तम, घांटगे आदि महाराष्ट्रीयन राजा,
ये सभी आदिलशाह के बलशाली सरदार मुल्लामंहमदं के नेतृत्व को क्रमपूर्वक स्वीकार करने लगे।
बाद में, जब मुगल सेना उत्तर से और आदिलशाह की सेना दक्षिण से आगे बढ़ रही थी, तो निजाम शाह द्वारा भेजे गये अंबर ने उन पर आक्रमण किया।
जिस प्रकार तारकासुर के साथ युद्ध में देवता कार्तिकेय के चारों ओर एकत्रित हुए, उसी प्रकार शाहजी प्रभृति राजा मलिकंबर के चारों ओर एकत्रित हुए।
बाद में, मलिकंबर ने दुश्मन के साथ भीषण लड़ाई लड़ी, जिसके परिणामस्वरूप पिशाच, भूत, वेताल और निशाचर प्राणियों का सुख छीन गया।
दौड़ते पोड़ों के खुरों से उड़ी हुई धूल से सूर्य वृत्त के निस्तेज होने से ऐसा लग रहा था मानो सूर्य आसमान में बादलों से आच्छादित हो गया हो।
पृथ्वी से उड़ने वाली धूल की, आसमान को छूने वाली एक विशाल श्रेणी बनी और मानो वह शीघ्र ही स्वर्गारोहण करने वाले वीरों के लिए सीढ़ी सी प्रतीत हो रही थी।
घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की दहाड़, वीरों की सिंह जैसी गर्जना, दुंदुभी की ध्वनि,
तत्पर धनुषों की भीषण टंकार, वायु से फड़कने वाले झंडों की तेज़ फड़फड़ाहट,
मेघ के समान गंभीर आवाज वाले भाटो का जयघोष, इन सबसे परिपूर्ण होकर आकाश प्रतिध्वनि करने लगा और
एक दूसरे पर दौड़कर जाने वाले पराक्रमी शूरवीर योद्धाओं के भीषण पदाघात से शतधा पृथ्वी विदीर्ण हो गई।
अरे! एक पक्ष के योद्धाओं ने शत्रु योद्धाओं के सिरों पैरों को काट दिया और अचानक जाकर गिरने वाले नुकीले बाणों से उन्हें छेद दिया।
जिनके बाल खून से लथपथ हो गये है, जिनकी आंखें लाल हो गई हैं और जिनके दांत उनके होठों को काट रहे हैं, ऐसे उन बीर योद्धाओं के सिर जमीन पर गिरने लगे।
वज्र के समान मजबूत हाथी के दांतों पर योद्धाओं की मजबूत पकड़ वाली तलवारें गिरने लगी।
शत्रुपक्ष के योद्धाओं के तलवार से दो टुकड़े करके प्रत्येक क्षण में एक वीर का सिर विहीन शरीर जमीन पर गिरने लगा।
सैकड़ों बाणों से विदीर्ण हाथी की गंडस्थली से मद रस के साथ-साथ काफी खून बहने लगा जिससे पृथ्वी शोभायमान होने लगी।
पुरुषों, घोड़ों, हाथियों के खून की नदी के किनारे, मानो महान वीर योद्धा महानिद्रा ले रहे हो, ऐसा प्रतीत हो रहा है।
निशानेबाजी में दक्ष और हाथ में भाला धारण करने वाले वीरों ने शत्रुपक्ष के घुडसवार को मार दिया जिससे घोड़े अत्यंत क्रोध से चिढ़कर इधर उधर दौड़ने लगे।
बाद में, शाहजी, शरीफजी, महाबलवान खेलोजी और कृष्णमुखी यवन तथा
हम्मीराज प्रभृति जैसे अन्य शक्तिशाली वीरों ने अपने हाथों में तीर, चक्र, तलवार, भाले और पट्टे लेकर
मुसलमानों के विशाल सेना का वध करना शुरू किया। तब वे भयभीत होकर अपनी जान बचाने के लिए दसों दिशाओं में भागने लगे।
मुगलों की सेना को जाते देख इब्राहिम आदिलशाह भी अपनी सेना के साथ भयभीत होकर भाग गया।
उस मदमस्त हाथी के बल पर मनचेहर नाम का एक अभिमानी मुगल, उस दौड़ती हुई सेना के पृष्ठभाग की रक्षा करने लगा।
अभिमान से मार्ग अवरूद्ध करके बीच में खड़ा वह मानो दूसरा विंध्याचल पर्वत हो,
ऐसे उस विजय में बाधक बनकर आये हुए मनचेहर को देखकर शहाजी और शरीफजी आदि सभी पराक्रमी योद्धाओं ने उनका संहार करना शुरू किया।
विशाल पर्वत के समान विशालकाय हाथी की दीवार के आश्रय में खड़े हुए उस अत्यंत गर्वित मनचेहर से कवचधारी वीर लड़ने लगे।
तब निडर और युद्धप्रिय, शरीफजी ने एकाग्रचित्त होकर अपने तेज भाले के प्रहार से हाथियों की सेना को मार डाला।
त्रिशूल, धनुष, बाण, गदा, परिघ (लोहे बद्ध दंड) ऐसे शखों को धारण करने वालीं गज सेना ने आगे बढ़ते हुए शरीफजी को रोक दिया।
बाद में चारों दिशाओं में लड़ने वाले एवं क्रोधित उस अभिमानी शरीफजी को, उन्होंने अपने तीखे बाणों से मार गिराया।
शत्रु के हाथियों का विध्वंस करके, शत्रु के बाण से विदीर्ण होकर वीरगति को प्राप्त हो गये।
अपने शूरवीर छोटे भाई को धरातल पर गिरा हुआ देखकर क्रोधित शहाजीराजे खेलकर्ण आदि अपने बंधुओं के साथ मनचेहर एवं उसकी सेना पर वेगपूर्वक चढ़ाई की।
तब वह प्रतापी मुगल, शत्रु के उत्कृष्ट भाले के भय से अपने मदमस्त हाथियों को पीछे हटता हुआ देखकर वह स्वयं पीछे हट गया।
जैसे ही वह सुरक्षित हाथियों के साथ युद्ध के मैदान से भागने लगा तो निजामशाह की सेना सिंह गर्जना करने लगी।
तब वे मुगल सेना उत्तर की ओर, कुछ पश्चिम की ओर और कुछ पूर्व की ओर तेजी से भागने लगी।
बाद में, आनन्दित होकर, शाहजी प्रभृति राजाओं ने भागते हुए शत्रु का पीछा किया और उन्हें बलपूर्वक पकड़ लिया।
इस प्रकार अत्यधिक बलशाली भोंसलों के बाहुबल की मदद से दुश्मन को जीतकर प्रतापी मलिकंबर ढोल और नगाड़ों के जयकार के साथ तुरंत निजामशाह से मिलने गया।
प्रतापी एवं अद्भूत महिमान्वित ऐसी उस दिल्लीपति की अजेय सेना, उसी प्रकार आदिलशाह की अतुल सामर्थ्यवान अजेय सेना, इनकी सहायता से पराजित करके और
युद्ध में अभिमानी सेनापतियों को बंदी बनाकर, वह उग्रकर्मा सेनापति मलिकंबर भोंसले के साथ निजामशाह को प्रणाम किया।
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