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शिवभारतम् • अध्याय 4 • श्लोक 54
तमन्तरा स्थिरं दर्पादन्तरायं जयश्रियाम्। पुरः पन्थानमावृत्य स्थितं विन्ध्यमिवापरम्।।
अभिमान से मार्ग अवरूद्ध करके बीच में खड़ा वह मानो दूसरा विंध्याचल पर्वत हो,
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