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अध्याय 3 — तृतीयः प्रश्नः

प्रश्न
12 श्लोक • केवल अनुवाद
तत्पश्चात् अश्वलपुत्र कौशलन ने उनसे पूछा - भगवन्, यह 'प्राण' कहीं से उत्पन्न होता है? यह इस शरीर में कैसे आता है अथवा स्वयं को विभाजित करके कैसे स्थित होता है? किसके द्वारा उत्क्रमण (प्रयाण) कर जाता है, अथवा किस प्रकार बाह्य विषय एवं आन्तरिक अध्यात्म को धारण करता है?
ऋषि पिप्पलाद ने उसे उत्तर दिया - "तुम बहुत सारे एवं दुरूह प्रश्न पूछ रहे हो; परन्तु, क्योंकि तुम अतिपुण्यात्मा (ब्रह्मिष्ठ) हो, इसलिए मैं तुम्हें बताऊँगा।"
आत्मा' से ही यह प्राण-वायु उत्पन्न होता है; जिस प्रकार पुरुष से ही छाया उत्पन्न होती है, उसी प्रकार यह प्राण आत्मा में विस्तीर्ण (व्याप्त) है तथा मन की प्रक्रिया से यह इस शरीर में प्रवेश करता है।
जिस प्रकार कोई सम्राट् अपने अधिकारियों को नियुक्त करता है तथा किसी एक को आदेश देता है - 'मेरे लिए इन ग्रामों पर तुम शासन करो', तथा किसी अन्य को आदेश देता है - 'इन दूसरे ग्रामों पर मेरे लिए तुम शासन करो', इसी प्रकार यह वायु, यह 'प्राण' अन्य प्राणों को उनके पृथक्-पृथक् क्षेत्रों में नियुक्त करता है।
वायू एवं उपस्थ में अपान (निम्न वायु) स्थित है, तथा चक्षु, कर्ण मुख एवं नासिका में स्वयं प्राण (मुख्य वायु) स्थित है, किन्तु मध्य में स्थित है समान (मध्यवर्ती वायु)। यही है जो हुतात्र (दग्ध अन्नाहुति) को समान रूप से वितरित करता है; कारण, इसी से सप्त-आग्नियों का जन्म होता है।
यह 'आत्मा' हृदय में निवास करता है, और इस हृदय में एक सौ एक नाड़ियाँ होती हैं, एवं प्रत्येक नाड़ी में सौ-सौ शाखानाड़ियाँ होती हैं तथा प्रत्येक शाखा-नाड़ी की बहत्तर हजार उपशाखानाड़ियाँ होती हैं, इन सबमें संचरण करता है व्यान वायु।
इन अनेकों में एक है जिससे उदान वायु (ऊपर की ओर) प्रयाण करता है तथा जो पुण्यों के द्वारा पुण्यलोक में, पापों के द्वारा पापों के नर्क में और पाप तथा पुण्य के मिश्रित कर्मों से पुनः मनुष्य लोक में वापिस ले आता है।
इस शरीर के बाहर सूर्य ही है मुख्य प्राण, कारण यह उदित होते हुए चक्षुओं को सम्पोषित करता है। पृथ्वी में जो देवत्व है वह मनुष्य के अपान वायु को आकृष्ट करता है, और जो अन्तरिक्ष है वह मध्यवर्ती वायु (समान) है; वायु व्यान है।
तेज' आदि-ऊर्जा, ही है उदान; अतः जब मनुष्य में तेज तथा ऊष्मा क्षीण होने लगती हैं, तब उसकी इन्द्रियां मन में सिमट जाती हैं तथा अवस्था में वह पुनर्जन्म के लिए प्रयाण कर जाता है।
मनुष्य जब देहत्याग करता है उस समय उसका चित्त (मन) जैसा होता है, उसी चित्त से वह प्राण में आश्रय लेता है, और प्राण तथा उदान (तेन) संयुक्त होकर 'आत्मा' के साथ उसे उसके संकल्पित लोक में ले जाते हैं।
जो विद्वान् 'प्राण' के सम्बन्ध में इस प्रकार जानता है, उसका वंश क्षीण (व्यर्थ) नहीं होता, वह अमर हो जाता है। जिसके लिए यह श्लोक (श्रुतिवचन) है।
प्राण' की उत्पत्ति, उसका आगमन, उसकी स्थिति, पञ्चविध क्षेत्रों में उसका विभुत्व (प्रभुत्व) इसी प्रकार 'आत्मा' से उसका सम्बन्ध, सब जानकर मनुष्य अमृतत्व का पान करता है।
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