मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
प्रश्न • अध्याय 3 • श्लोक 5
पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः। एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥
वायू एवं उपस्थ में अपान (निम्न वायु) स्थित है, तथा चक्षु, कर्ण मुख एवं नासिका में स्वयं प्राण (मुख्य वायु) स्थित है, किन्तु मध्य में स्थित है समान (मध्यवर्ती वायु)। यही है जो हुतात्र (दग्ध अन्नाहुति) को समान रूप से वितरित करता है; कारण, इसी से सप्त-आग्नियों का जन्म होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
प्रश्न के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

प्रश्न के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें