पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः।
एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥
अपान(निम्नगामी वायु)पायु और उपस्थ में स्थित होता है। प्राण स्वयं चक्षु, श्रोत्र, मुख और नासिका में प्रतिष्ठित रहता है। इनके मध्य में समान वायु स्थित होता है।
यह समान ही अन्न को समभाव से पचाकर वितरित करता है; इसलिए यह सप्त अग्नियों(सप्तार्चि) के रूप में प्रतिष्ठित माना जाता है।
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