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प्रश्न • अध्याय 3 • श्लोक 4
यथा सम्रादेवाधिकृतान्‌ विनियुङ्क्ते। एतन्‌ ग्रामानोतान्‌ ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान्‌ प्राणान्‌ पृथक्‌पृथगेव सन्निधत्ते ॥
जिस प्रकार कोई सम्राट (राजा) अपने अधीन अधिकारियों को विभिन्न कार्यों में नियुक्त करता है, जैसे—“इस गाँव में जाओ, उस गाँव में रहो”, उसी प्रकार यह प्राण अन्य सभी प्राणों को उनके-उनके स्थानों में अलग-अलग स्थापित और नियोजित करता है।
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