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प्रश्न • अध्याय 3 • श्लोक 12
उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा। अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥
जो पुरुष प्राण की उत्पत्ति, आगमन, स्थान और व्यापकता—इन पाँच प्रकार के स्वरूपों को आध्यात्मिक दृष्टि से जान लेता है, वह निश्चय ही अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
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