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प्रश्न • अध्याय 3 • श्लोक 6
हृदि ह्येष आत्मा। अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति ॥
यह आत्मा वास्तव में हृदय में स्थित है। यहाँ से एक सौ एक नाड़ियाँ निकलती हैं। उनमें से प्रत्येक नाड़ी की सौ-सौ शाखाएँ हैं, और प्रत्येक शाखा की बहत्तर-बहत्तर उपशाखाएँ होती हैं। इन समस्त नाड़ियों में व्यान वायु प्रवाहित होकर शरीर में व्यापक रूप से संचरण करता है।
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