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प्रश्न • अध्याय 3 • श्लोक 10
यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः। सहात्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति ॥
जैसा चित्त होता है, उसी के अनुरूप यह प्राण शरीर में प्रविष्ट होता है; और यह प्राण तेजस् (ऊर्जा/चेतन-प्रकाश) से संयुक्त होकर, आत्मा के साथ मिलकर जीव को उसके संकल्प के अनुसार विभिन्न लोकों की ओर ले जाता है।
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