जैसा चित्त होता है, उसी के अनुरूप यह प्राण शरीर में प्रविष्ट होता है; और यह प्राणतेजस्(ऊर्जा/चेतन-प्रकाश) से संयुक्त होकर, आत्मा के साथ मिलकर जीव को उसके संकल्प के अनुसार विभिन्न लोकों की ओर ले जाता है।
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