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अध्याय 1 — निरालम्बोपनिषद्

निरालम्ब
39 श्लोक • केवल अनुवाद
उस कल्याणकारी (शिव) गुरु, जो सत्-चित्-आनन्द की मूर्ति हैं, उन्हें नमस्कार है। उस निष्प्रपञ्च, शान्त, आश्रयरहित तथा तेजःस्वरूप परमात्मा को नमन है। जो साधक निरालम्ब परमात्म-तत्त्व का आश्रय ग्रहण करके सांसारिक आलम्बनों का परित्याग कर देता है, वही योगी और संन्यासी कहलाता है। वही अंततः कैवल्य (मोक्ष) पद को प्राप्त करता है।
इस संसार के अज्ञानी जीवों के सभी अरिष्टों (कष्टों) की शान्ति के निमित्त जो-जो ज्ञान आवश्यक है, उसकी आशंका करके (उसके उत्तर के रूप में) मैं यहाँ कहता हूँ (पूछता हूँ)
ब्रह्म क्या है? ईश्वर कौन है? जीव कौन है? प्रकृति क्या है? परमात्मा कौन है? ब्रह्मा कौन है? विष्णु कौन है? रुद्र कौन है? इन्द्र कौन है? यम कौन है? सूर्य कौन है? चन्द्र कौन है? देवता कौन हैं? असुर कौन हैं? पिशाच कौन हैं? मनुष्य क्या हैं? स्त्रियाँ क्या हैं? पशु आदि क्या हैं? स्थावर (जड़) क्या है? ब्राह्मण आदि क्या हैं? जाति क्या है? कर्म क्या है? अकर्म क्या है? ज्ञान और अज्ञान क्या हैं? सुख-दुःख क्या हैं? स्वर्ग-नरक क्या हैं? बंधन और मुक्ति क्या हैं? उपासना करने योग्य कौन है? शिष्य कौन है? विद्वान् कौन है? मूर्ख कौन है? असुरत्व क्या है? तप क्या है? परमपद किसे कहते हैं? ग्रहणीय और अग्रहणीय क्या हैं? संन्यासी कौन है? इस प्रकार शंका व्यक्त करके उन्होंने ब्रह्म आदि का स्वरूप विवेचित किया।
उन्होंने कहा कि महत् तत्त्व, अहं, पृथिवी, आप, तेजस्, वायु और आकाश रूप बृहद् ब्रह्माण्ड कोश वाला, कर्म और ज्ञान के अर्थ से प्रतिभासित होने वाला, अद्वितीय, सम्पूर्ण (नाम रूप आदि) उपाधियों से रहित, सर्व शक्तिसम्पन्न, आद्यन्तहीन, शुद्ध, शिव, शान्त, निर्गुण और अनिर्वचनीय चैतन्य स्वरूप परब्रह्म कहलाता है। अब ईश्वर के स्वरूप का कथन करते हैं। यही ब्रह्म जब अपनी प्रकृति (शक्ति) के सहारे लोकों का सृजन करता है और अन्तर्यामी स्वरूप से (उनमें) प्रविष्ट होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा बुद्धि और इन्द्रियों को नियन्त्रित करता है, तब उसे ईश्वर कहते हैं।
जब इस चैतन्यस्वरूप ईश्वर को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा इन्द्रादि नामों और रूपों के द्वारा देह का मिथ्या अभिमान हो जाता है कि “मैं स्थूल हूँ”, तब उसे जीव कहते हैं। यह चैतन्य ‘सोऽहं’ स्वरूप में एक ही होने पर भी शरीरों की भिन्नता के कारण जीव अनेकविध प्रतीत होता है।
प्रकृति वही है, जो ब्रह्म की शक्ति है। वही बुद्धिरूप होकर ब्रह्म से विविध एवं विचित्र जगत् की रचना करने की सामर्थ्य रखती है। उसी ब्रह्मशक्ति को प्रकृति कहा जाता है।
देहादि से परे रहने के कारण ब्रह्म को ही परमात्मा कहते हैं।
यही परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम, सूर्य और चन्द्र आदि देवता के रूप में; यही असुर, पिशाच, नर-नारी और पशु आदि के रूप में प्रकट होता है; यही जड़-पदार्थ और ब्राह्मण आदि भी है।
यही समस्त विश्व ही ब्रह्म हैं, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
जाति (शरीर के) चर्म, रक्त, मांस, अस्थियों और आत्मा की नहीं होती। उसकी (मानव, पशु-पक्षी या ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जाति की) प्रकल्पना तो केवल व्यवहार के निमित्त की गई है। (ऋषि यहाँ स्पष्टता से कहते हैं कि जाति शरीर भेद से नहीं, व्यवहार भेद से निर्धारित की गयी है।)
इन्द्रियों द्वारा की जाने वाली क्रियाओं को कर्म कहते हैं। जिस क्रिया को "मैं करता हूँ" इस भावपूर्वक (अध्यात्म निष्ठा से) किया जाता है, वही कर्म है। कर्त्तापन और भोक्तापन के अहंकार के द्वारा फल की इच्छा से किये गये बन्धन स्वरूप नित्य-नैमित्तिक यज्ञ, व्रत, तप, दान आदि कर्म ’अकर्म’ कहलाते हैं।
सृष्टि की सभी बदलने वाली वस्तुओं में एक ही अपरिवर्तनशील चैतन्य तत्त्व विद्यमान है, अन्य कुछ भी नहीं है, द्रष्टा और दृश्य जो कुछ भी है, सब कुछ चैतन्य तत्त्व ही है। सबके अन्दर यह चैतन्य तत्त्व ही विद्यमान रहने पर भी ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह घट-वस्त्रादि रूप में ही परिवर्तित हो गया है। इसी साक्षात्कार की अनुभूति को ज्ञान कहते हैं। यह अनुभूति शरीर और इन्द्रिय आदि पर नियंत्रण रखने से और सद्गुरु की उपासना, उनके उपदेशों के श्रवण, चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करने से होती है।
जिस प्रकार रस्सी में सर्प की भ्रान्ति होती है, उसी प्रकार सब में विद्यमान ब्रह्म और देव, पशु-पक्षी, मनुष्य, स्थावर, स्त्री-पुरुष, वर्ण-आश्रम, बन्धन मुक्ति आदि सभी अनात्म वस्तुओं में भेद मानना ही ‘अज्ञान’ है।
सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा के ज्ञान से जो आनन्दपूर्ण स्थिति बनती है, वही सुख है।
अनात्म रूप (नश्वर) विषयों का सङ्कल्प (विचार) करना दुःख कहलाता है।
सत् का (अनश्वर का) समागम (सत्पुरुषों का सत्संग) ही स्वर्ग है। असत् (नश्वर) संसार के विषयों (में रचे-पचे लोगों) का संसर्ग ही नरक है।
अनादि अविद्या की वासना (संस्कार) द्वारा उत्पन्न इस प्रकार का विचार कि ‘मैं हूँ’, यही बन्धन है।
माता-पिता, भ्राता, पुत्र, गृह, उद्यान तथा खेत आदि मेरे अपने हैं, यह सांसारिक विचार भी बन्धन ही हैं।
कर्तापन के अहंकार का संकल्प भी बन्धनरूप है।
अणिमा आदि (अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये अष्ट सिद्धियाँ अथवा ऐश्वर्य हैं) आठ ऐश्वर्यों को प्राप्त करने का संकल्प भी बन्धन है।
मनोकामना की पूर्ति के संकल्पपूर्वक की गई देवताओं और मनुष्यों की उपासना भी बन्धन रूप है।
यम आदि (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) आठ अङ्गों वाले योग का संकल्प भी बन्धन ही है।
वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) और आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) धर्म-कर्म के संकल्प भी बन्धन स्वरूप हैं।
आज्ञा, भय, संशय आदि आत्म-गुणों के संकल्प भी बन्धन हैं।
यज्ञ, व्रत, तप और दान के विधि-विधान तथा ज्ञान के संकल्प भी बन्धन हैं।
मोक्ष प्राप्ति का विचार करना भी बन्धन रूप है।
संकल्प मात्र से जो कुछ सम्भव है, वह सभी बन्धन स्वरूप है।
जब नित्य और अनित्य वस्तुओं के विषय में विचार करने से नश्वर संसार के सुख-दुःखात्मक सभी विषयों से ममतारूपी बन्धन विनष्ट हो जाएँ, उस (स्थिति) को मोक्ष कहते हैं।
समस्त शरीरों में स्थित, चैतन्यस्वरूप ब्रह्म को प्राप्त करने वाला गुरु ही उपास्य (पास बैठने योग्य) है।
जिसके हृदय में विद्या द्वारा नष्ट हुए जगत् के अवगाहन से उत्पन्न ब्रह्म रूप ज्ञान शेष रहे, वही शिष्य है।
सबके अन्तर में स्थित आत्म तत्त्व के विज्ञानमय स्वरूप को जानने वाला ही विद्वान् है।
कर्त्तापन आदि के भाव में आरूढ़ व्यक्ति ही मूढ़ (मूर्ख) है।
जो ब्रह्मा, विष्णु, ईशान और इन्द्र आदि देवों के ऐश्वर्य की कामनापूर्वक व्रत, जप, यज्ञ आदि में अन्तरात्मा को तपाये तथा अत्युग्र राग-द्वेष, हिंसा, दम्भ आदि दुर्गुणों से युक्त होकर जो तप करे, वह आसुरी तप कहलाता है।
"ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है", इस प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान से ब्रह्मा आदि देवों के ऐश्वर्य प्राप्त करने के सङ्कल्प बीज को संतप्त करना (जला डालना) ही (यथार्थ) तप कहा जाता है।
प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरण आदि से भिन्न सच्चिदानन्द स्वरूप और नित्यमुक्त ब्रह्म का स्थान परमपद कहलाता है।
देश, काल, वस्तु की मर्यादा से परे चिन्मात्र स्वरूप (जो कुछ है, वह) ही ग्रहण करने योग्य (ग्राह्य) है।
निजस्वरूप से परे, माया द्वारा कल्पित और बुद्धि तथा इन्द्रियगम्य जगत् की सत्यता का चिन्तन अग्राह्य है।
जो समस्त धर्मों (कर्मों) में ममता एवं अहंकार का परित्याग करके इष्ट (ब्रह्म) की शरण में जाकर और ‘तू वही है’, ‘हम ब्रह्म हैं’, ‘जो कुछ भी यह है, सब कुछ निश्चित ही ब्रह्म है’, ‘इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है’, आदि इन महावाक्यों द्वारा ‘मैं ब्रह्म हूँ’, इस प्रकार का निश्चय करके निर्विकल्प समाधि में लीन रहकर परम स्वतन्त्र और यतिस्वरूप होता है, वह पुरुष संन्यासी कहलाता है। वही मुक्त, पूज्य, योगी, परमहंस, अवधूत और ब्राह्मण होता है।
इस निरालम्ब उपनिषद् का जो (साधक) गहन अध्ययन करता है, गुरु कृपा से वह अग्निपूत (अग्नि की तरह पवित्र) और वायुपूत (वायु की तरह पावन) हो जाता है, फिर उसका पुनरावर्तन नहीं होता, वह पुनः पुनः जगत् में जन्म नहीं लेता। निरालम्ब उपनिषद् का यही रहस्य है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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