संन्यासीति च सर्वधर्मान्परित्यज्य निर्ममो निरहंकारो भूत्वा ब्रह्मेष्टशरणमुपगम्य तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचनेत्यादिमहावाक्यार्थानुभवज्ञानाद् ब्रह्मैवाहमस्मीति निश्चित्य निर्विकल्पसमाधिना स्वतन्त्रो यतिश्चरति स संन्यासी स मुक्तः स पूज्यः स योगी स परमहंसः सोऽवधूतः स ब्राह्मण इति।।
जो समस्त धर्मों(कर्मों) में ममता एवं अहंकार का परित्याग करके इष्ट(ब्रह्म) की शरण में जाकर और ‘तू वही है’, ‘हम ब्रह्म हैं’, ‘जो कुछ भी यह है, सब कुछ निश्चित ही ब्रह्म है’, ‘इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है’, आदि इन महावाक्यों द्वारा ‘मैं ब्रह्म हूँ’, इस प्रकार का निश्चय करके निर्विकल्प समाधि में लीन रहकर परम स्वतन्त्र और यतिस्वरूप होता है, वह पुरुष संन्यासी कहलाता है।
वही मुक्त, पूज्य, योगी, परमहंस, अवधूत और ब्राह्मण होता है।
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