कर्मेति च क्रियमाणेन्द्रियैः कर्माण्यहं करोमीत्यध्यात्मनिष्ठतया कृतं कर्मैव कर्म। अकर्मेति च कर्तृत्वभोत्त्कृत्वाद्यहंकारतया बन्धरूपं जन्मादिकारणां नित्यनैमित्तिकया-गव्रततपोदानादिषु फलाभिसंधानं यत्तदकर्म॥
इन्द्रियों द्वारा की जाने वाली क्रियाओं को कर्म कहते हैं।
जिस क्रिया को "मैं करता हूँ" इस भावपूर्वक (अध्यात्म निष्ठा से) किया जाता है, वही कर्म है।
कर्त्तापन और भोक्तापन के अहंकार के द्वारा फल की इच्छा से किये गये बन्धन स्वरूप नित्य-नैमित्तिक यज्ञ, व्रत, तप, दान आदि कर्म ’अकर्म’ कहलाते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
निरालम्ब के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
निरालम्ब के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।