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निरालम्ब • अध्याय 1 • श्लोक 6
प्रकृतिरिति च ब्रह्मणः सकाशान्नानाविचित्रजगन्निर्माणसामर्थ्यबुद्धिरूपा ब्रह्मशक्तिरेव प्रकृतिः॥
प्रकृति वही है, जो ब्रह्म की शक्ति है। वही बुद्धिरूप होकर ब्रह्म से विविध एवं विचित्र जगत् की रचना करने की सामर्थ्य रखती है। उसी ब्रह्मशक्ति को प्रकृति कहा जाता है।
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