उपास्य इति च सर्वशरीरस्थचैतन्यब्रह्मप्रापको गुरुरुपास्यः॥
समस्त शरीरों में स्थित, चैतन्यस्वरूप ब्रह्म को प्राप्त करने वाला गुरु ही उपास्य(पास बैठने योग्य) है।
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