जीव इति च ब्रह्मविष्णवीशानेन्द्रादीनां नामरूपद्वारा स्थूलो ऽहमिति मिथ्याध्यासवशाज्जीवः। सोऽहमेकोऽपि देहारम्भकभेदवशाद्बहुजीवः॥
जब इस चैतन्यस्वरूप ईश्वर को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा इन्द्रादि नामों और रूपों के द्वारा देह का मिथ्या अभिमान हो जाता है कि “मैं स्थूल हूँ”, तब उसे जीव कहते हैं।
यह चैतन्य ‘सोऽहं’ स्वरूप में एक ही होने पर भी शरीरों की भिन्नता के कारण जीव अनेकविध प्रतीत होता है।
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