मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
निरालम्ब • अध्याय 1 • श्लोक 37
अग्राह्यमिति च स्वस्वरूपव्यतिरिक्त मायामयबुद्धीन्द्रियगोचर जगत्स-त्यत्वचिन्तनमग्राह्यम्॥
निजस्वरूप से परे, माया द्वारा कल्पित और बुद्धि तथा इन्द्रियगम्य जगत् की सत्यता का चिन्तन अग्राह्य है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
निरालम्ब के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

निरालम्ब के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें