अग्राह्यमिति च स्वस्वरूपव्यतिरिक्त मायामयबुद्धीन्द्रियगोचर जगत्स-त्यत्वचिन्तनमग्राह्यम्॥
निजस्वरूप से परे, माया द्वारा कल्पित और बुद्धि तथा इन्द्रियगम्य जगत् की सत्यता का चिन्तन अग्राह्य है।
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