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अध्याय 1 — मन्त्रिकोपनिषद्
मंत्रिका
20 श्लोक • केवल अनुवाद
आठ चरणों वाले
,
पवित्र स्वरूप
,
हंस
(परमात्मा)
रूप
,
त्रिसूत्र
(व्यष्टि, समष्टि, तदुभय)
रूप
,
अतिसूक्ष्म
,
अव्यय
और
देदीप्यमान
उस
परमात्म चेतना
को हम
(भक्ति, ज्ञान, कर्म)
तीन मार्गों से सर्वत्र अनुभव करते हैं; परन्तु देख नहीं पाते।
यद्यपि यह परमात्म चेतना
निर्गुण
है, तो भी वह
गुण रूपी गुहा
में समाया हुआ है। सामान्य पुरुष
मोह
से सम्मोहित अवस्थाजन्य अन्धकार में निमग्न रहते हैं; परन्तु
सात्त्विक गुणों
में अवस्थित रहने वाले पुरुष उसे अपने
अन्तःकरण
में देखते हैं।
अन्य किसी प्रकार से भी
ध्यान
किया जाए, तो भी उस
परमात्म चेतना
को अज्ञानी पुरुष नहीं देख सकते, क्योंकि जगत् में विकारों को जन्म देने वाली,
अज्ञान रूप वाली
,
आठरूप वाली
(पंचभूत, मन, बुद्धि, अहंकार)
,
अजन्मा
(प्रकृति रूप)
माया
का प्रभाव अविचल रहता है।
ध्यान
(चिन्तन)
के द्वारा ही उस
माया
के ज्ञान की प्राप्ति होती है। उसी
(माया)
के द्वारा यह
(आध्यात्मिक-जीव)
विस्तार को प्राप्त होता है और
(बन्धन से मुक्त होने के लिए)
प्रेरित होता है। वस्तुतः
पुरुष
जो
(आध्यात्मिक)
पुरुषार्थ
करता है, उसी
पुरुषार्थ
के द्वारा यह जगत् अधिष्ठित है।
यह
गौरुपी माया
उत्पत्ति और प्रलय से युक्त है, सबकी सहायिका है, प्राणी मात्र की
पोषिका
है। यह
श्वेत
,
कृष्ण
और
रक्तवर्ण
(सत्, रज, तम)
है तथा सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाली है।
सभी
जीव
(कुमार)
इस
माया रूपी गौ
के पय का दोहन करते हैं; परन्तु वह
परम पुरुष
इस माया के विषयों से भिन्न और अविज्ञात है, वह स्वयं स्वच्छन्द रहकर, सभी प्राणियों को वश में रखकर अकेला ही
(सम्पूर्ण प्राणियों में-आत्म रूप में)
माया का पय:पान
(निर्लिप्त रहकर)
करता है।
सर्व साधारण द्वारा दुही जाती और
याज्ञिकों
द्वारा यजन की जाती हुई इस
माया रूपी गौ
का वह
भगवान्
(ऐश्वर्यशाली)
ध्यान
(चिन्तन)
और
क्रिया
(यौगिक क्रिया)
द्वारा उपभोग करता है और उसे अत्यन्त व्यापक बनाता जाता है।
महात्मा पुरुष
सु-रूप
(वर्ण)
वाले इस
जगत् रूप पीपल
का फल खाते हैं और इस जगत् की
माया
में उस
उदासीन परम पुरुष
और
परमहंस
को ही देखते हैं। सभी
स्नातक
और
अध्वर्युगण
उसी का गान करते हैं।
शास्त्रज्ञ जन ऋचाओं
के माध्यम से तथा
स्तोता जन
(स्तुतियों के द्वारा)
उसी
परम पुरुष
की स्तुति करते हैं और उसी के लिए
रथन्तर संज्ञक
तथा
बृहत्साम
को
सप्तविध गान
करते हैं।
मन्त्रों का रहस्य
ही
ब्रह्म
है, उसी को
भृगुवंशी श्रेष्ठ
‘भार्गव’
लोग
अथर्ववेदीय पद और क्रम
के अनुसार पढ़ते हैं।
यह परम-पुरुष
ब्रह्मचारी वृत्ति वाला
,
स्तम्भ के सदृश अटल
,
जगत् रूप में फलयुक्त
,
जगत् रुप शकट का वाहक
,
रजोगुण से रहित
,
सत्त्वगुण सम्पन्न
तथा
अत्यन्त व्यापक
रूप में दिखाई देने वाला है।
(षडैश्वर्य सम्पन्न)
यह परमपुरुष भगवान्
कालरूप
,
प्राणरूप
,
मृत्युरूप
,
शर्वरूप
,
महेश्वररुप
,
भवरूप
,
रुद्ररूप
,
उग्ररूप
,
ससुर
(देवयुक्त)
तथा
सासुर
(असुरयुक्त)
भी हैं।
वह
परमदेव
,
प्रजापति
,
विराट् पुरुष
और
जलादि देवताओं
के रूप में सबके लिए स्तुति करने योग्य है।
अथर्ववेद
द्वारा उसके
व्यापक रूप
का परिज्ञान होता है।
कोई उसे
छब्बीसवाँ तत्त्व
कहते हैं, कोई
सत्ताईसवाँ तत्त्व
कहते हैं।
अथर्वशिर
(उपनिषद्)
के ज्ञाता उसे
निर्गुण सांख्यपुरुष
कहते हैं।
कोई उसे
चौबीस संख्यक तत्त्वों वाला
(सांख्य दर्शन)
, कोई उसे
व्यक्त
(जगत्)
और कोई
अव्यक्त
(प्रकृति)
मानते हैं। कोई उसे
द्वैत
(जीव-ब्रह्म)
और कोई
अद्वैत
(ब्रह्म)
मानते हैं। इसी प्रकार कोई उसे
तीन रूपों
(ब्रह्मा, विष्णु, महेश)
वाला और कोई
पाँच रूपों वाला
(ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी और गणेश)
मानते हैं।
अनेक ज्ञान-दृष्टि सम्पन्न विद्वान्
ब्रह्म
(सबसे बड़ा तथा चैतन्य रूप)
से लेकर
जड़-पदार्थों
तक में एक ही अतिशुभ्र
(शुद्ध)
व्यापक सर्वोच्च सत्ता को व्याप्त हुआ अनुभव करते हैं।
यह सम्पूर्ण
जड़-चेतन जगत्
उस
ब्रह्म
में हो समाया हुआ है। जिस प्रकार
नदियाँ
बहती हुई
समुद्र
में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण
जगत्
भी उस
ब्रह्म
में ही लय को प्राप्त होता है।
जिस प्रकार
पानी का बुल-बुला
पानी से उत्पन्न होता है और पानी में ही लय हो जाता है; उसी प्रकार जिसमें सम्पूर्ण
जीव-पदार्थ
जन्म लेते हैं तथा जिसमें लय होकर अदृश्य हो जाते हैं, उसी को ज्ञानीजन
ब्रह्म
कहते हैं।
वह
‘क्षेत्रज्ञ’
रूप में सम्पूर्ण
प्राणियों
में अधिष्ठित होता है और वह कार्य के पीछे
(समस्त)
कारणों को जानने वाला होता है। ऐसे उस
परम पुरुष
को
विद्वान् साधक
बार-बार देखते हैं।
जो
विद्वान्
(ब्रह्मवेत्ता)
उस
ब्रह्म
को जानते हैं, वे उसी
ब्रह्म
में लीन हो जाते हैं, उसी में लय होकर वे
अव्यक्त रूप
से सुशोभित होते हैं, यह सुनिश्चित है। यही
उपनिषद्
(रहस्य)
है।
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