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मंत्रिका • अध्याय 1 • श्लोक 6
पिबन्त्येनामविषयामविज्ञातां कुमारकाः। एकस्तु पिबते देवःस्वच्छन्दोऽत्र वशानुगः॥
सभी जीव (कुमार) इस माया रूपी गौ के पय का दोहन करते हैं; परन्तु वह परम पुरुष इस माया के विषयों से भिन्न और अविज्ञात है, वह स्वयं स्वच्छन्द रहकर, सभी प्राणियों को वश में रखकर अकेला ही (सम्पूर्ण प्राणियों में-आत्म रूप में) माया का पय:पान (निर्लिप्त रहकर) करता है।
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