ध्यायतेऽध्यासिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुनः।
सूयते पुरुषार्थं च तेनैवाधिष्ठितं जगत्॥
ध्यान(चिन्तन) के द्वारा ही उस माया के ज्ञान की प्राप्ति होती है। उसी (माया) के द्वारा यह (आध्यात्मिक-जीव) विस्तार को प्राप्त होता है और (बन्धन से मुक्त होने के लिए) प्रेरित होता है।
वस्तुतः पुरुष जो (आध्यात्मिक)पुरुषार्थ करता है, उसी पुरुषार्थ के द्वारा यह जगत् अधिष्ठित है।
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