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मंत्रिका • अध्याय 1 • श्लोक 17
यस्मिन्सर्वमिदं प्रोतं ब्रह्म स्थावरजंगमम्। तस्मिन्नेव लयं यान्ति स्रवन्त्यःसागरे यथा॥
यह सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् उस ब्रह्म में हो समाया हुआ है। जिस प्रकार नदियाँ बहती हुई समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् भी उस ब्रह्म में ही लय को प्राप्त होता है।
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