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अध्याय 97 — अथ पाकाध्यायः
बृहत्संहिता
17 श्लोक • केवल अनुवाद
सप्ताहात् सूर्य का फल एक पक्ष में, चन्द्र का एक मास में, मङ्गल का वक्त्रोक्तानुसार (भौमचार प्रकरणोक्तानुसार),
बुध का उदित काल तक में, बृहस्पति का एक वर्ष में, शुक्र का छ: मास में, शनि का एक वर्ष में, चन्द्रग्रहण में राहु का छः मास में, सूर्यग्रहण का एक वर्ष में,
त्वष्टा नामक ग्रह, तामस और कोलक का तत्काल, धूमकेतु का तीन मास में, बेतकेतु का सात रात में तथा सूर्य, चन्द्र के परिवेष, इन्द्रधनुष, सन्ध्या और अप्रसूची का फल सात दिन में होता है।
शौत और उष्ण का विपर्य्यय ( शीतकाल में उष्णता और उष्णकाल में शीतता ) का, विना ऋतु के फल-फूलों का, दिग्दाह का, स्थिर (वृक्षादि), चर (चतुष्पदादि ) का विपर्य्यय (वृक्षादि का चल और चतुष्पदादि का निश्चल होने) का और प्रसूति- विकृति का फल छः मास में होता है।
अक्रियमाण कार्य का (आचाररहित कार्य का, जो कभी नहीं किया, उसका या जो कभी नहीं किया, वह अकस्मात् किया उसका) करना, भूमिकम्प, प्राप्त उत्सव को नहीं करना, अशुभ अनभिमत वस्तु का होना, नहीं सूखने वाले सरोवर आदि का सूखना, नदियों के प्रवाहों का उलटा बहना-इनका फल छः मास में होता है।
खम्भा, मिट्टी की बनी हुई कोठी (कोठियाँ), प्रतिमा-इनका सम्भाषण करना, रोना, इनको अनुपात होना, इनमें पसीने का आना तथा कलह, इन्द्रधनुष और निर्घात का फल तीन मास में होता है। यदि इन्द्रधनुष का फल पूर्वकथित अवधि (एक सप्ताह) तक न हो तो तीन मास में होता है।
कीड़ों, चूहों, मक्खियों और सांपों की अधिकता, मृग और पक्षियों के शब्द, जल में बेले का तैरना-इनका फल तीन मास में होता है।
वन में कुत्तों का प्रसव होना, वनैले जीवों का गाँव में प्रवेश करना, शहद के छत्ते का लगाना, तोरण, इन्द्रध्वज-इनका फल एक वर्ष में या उससे भी कुछ अधिक समय में होता है।
सियार और गिद्धों के समूहों का फल दश दिन में, विना बजाये तुरही के शब्द का फल तत्काल तथा शाप, वल्मीक और भूमि के फटने का फल एक पक्ष में होता है।
अग्नि के बिना ज्वाला उठने का और घी, तेल, चीं आदि (मांस, रक्त, अन, मद्य, पुष्प, फल, पत्ता, मिट्टी और पत्थर) की वर्षा होने का फल तत्काल होता है तथा जनापवाद का फल डेढ़ मास में होता है।
छत्र, यज्ञ को चिति, याज्ञिक यूप, अग्नि, बोज-इन सबों में विकार उत्पन्न होने का फल सात पक्ष में होता है। कोई-कोई आचार्य छत्र और तोरण का फल एक मास में कहते हैं।
अतिशय शत्रुत्ता रखने वाले जीवों में परस्पर स्नेह, आकाश में प्राणियों का शब्द और चूहे के साथ मार्जार और नेवले के संग का फल एक मास में होता है।
गन्धर्वनगर, रस (मधुर आदि) में विकार और सुवर्ण में विकार का फल एक मास में होता है तथा ध्वज का भंग होना, गृह में विकार और धूलियों से व्याप्त सम्पूर्ण दिशाओं का फल भी एक मास में होता है।
अश्विनी से पुष्य तक के आठ नक्षत्रों के योगतारा में उत्पात हो तो क्रम से नव, एक, अद्वारह, एक, एक, छः, तीन और तीन मास में तथा आश्लेषा तत्काल फल देता है।
मघा से मूल तक के दश नक्षत्रों के योगतारा में उत्पात हो तो क्रम से एक, छः, छः, तीन, आधा, आठ, तीन, छः, एक और एक मास में, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा का फल चार मास में तथा अभिजित् नक्षत्र का फल तत्काल होता है।
श्रवण से रेवती तक के छः नक्षत्रों के योगतारा में उत्पात हो तो क्रम से सात, आत, देह, तोर, तीन और पांच मास में कल होव है
पदि पूर्वोक्त समय में फल दिखाई न दे के उससे द्विगुषित तुल्य काल में अधिक फल होता है: परन्तु ब्राह्मणों के द्वारा सुवर्ण, पल और गौ का दान आदि शान्ति काने से शान्त नहीं होने पर ही द्विगुषित काल में फहो७
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