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बृहत्संहिता • अध्याय 97 • श्लोक 17
निगदितसमये न दृश्यते चेद‌धिकतर द्विगुणे प्रपच्यते उत्। यदि न कनकरत्नगोप्रदानैरुपशभितं विधिवद् द्विजैछ शान्या ॥
पदि पूर्वोक्त समय में फल दिखाई न दे के उससे द्विगुषित तुल्य काल में अधिक फल होता है: परन्तु ब्राह्मणों के द्वारा सुवर्ण, पल और गौ का दान आदि शान्ति काने से शान्त नहीं होने पर ही द्विगुषित काल में फहो७
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