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बृहत्संहिता • अध्याय 97 • श्लोक 4
शीतोष्णविपर्यासः फलपुष्पमकालजं दिशां दाहः। स्थिरचरयोरन्यत्वं प्रसूतिविकृतिश्च षण्मासात् ॥
शौत और उष्ण का विपर्य्यय ( शीतकाल में उष्णता और उष्णकाल में शीतता ) का, विना ऋतु के फल-फूलों का, दिग्दाह का, स्थिर (वृक्षादि), चर (चतुष्पदादि ) का विपर्य्यय (वृक्षादि का चल और चतुष्पदादि का निश्चल होने) का और प्रसूति- विकृति का फल छः मास में होता है।
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