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बृहत्संहिता • अध्याय 97 • श्लोक 15
पित्र्यान्मासः षट् षट् त्रयोऽर्द्धमष्टौ च त्रिषडेकैकाः । मासचतुष्के ऽ पाढे सद्यः पाकाभिजित्तारा ॥
मघा से मूल तक के दश नक्षत्रों के योगतारा में उत्पात हो तो क्रम से एक, छः, छः, तीन, आधा, आठ, तीन, छः, एक और एक मास में, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा का फल चार मास में तथा अभिजित् नक्षत्र का फल तत्काल होता है।
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