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अध्याय 21 — अथ गर्भलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
37 श्लोक • केवल अनुवाद
संसार का प्राण अप है, वह अत्र वर्षा ऋतु के अधीन है; अतः यत्नपूर्वक वर्षा ऋतु की परीक्षा करनी चाहिये।
गर्ग, पराशर, काश्यप, यज्ञ आदि मुनियों के द्वारा निवद्ध गर्भलक्षण को देखकर में वर्षाकाल का लक्षण कर रहा हूँ।
जो देवज्ञ रात-दिन गर्भलक्षण में अविक्षिपा चित होकर लगे रहते है, मुनि को तरह उन्नते माणो तुहि-ज्ञान में निया नहीं होती है।
इस ज्योतिषशास्त्र से कौन शास्त्र अच्छा है? अर्थात् कोई नहीं; जिसको जानकर इस विनाशी कलिकाल में भी मनुष्य त्रिकालदर्शी होते हैं।
किसी का मत है कि कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के बाद गर्भ के दिन होते हैं। यह सबका मत नहीं है; अत: अब गर्ग आदि आचार्यों का मत कहते हैं।
मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से जब चन्द्रमा पूर्वाषाढा नक्षत्र में स्थित हो, उस समय से गर्भों का लक्षण जानना चाहिये। (यहाँ पर 'वा' शब्द चार्थक है) ।
चन्द्रमा के जिस नक्षत्र में स्थित होने से गर्भस्थिति होती है, चन्द्र के कारण १९५ये दिन में उसका प्रसय होता है।
यदि गर्भ शुक्ल पक्ष में हो तो कृष्ण पक्ष में, कृष्ण पक्ष में हो तो शुक्ल पक्ष म, दिन में हो तो रात्रि में, रात्रि में हो तो दिन में, पूर्व सन्ध्या में हो तो पश्चिम सन्ध्या में और पश्चिम सन्ध्या में हो तो पूर्व सन्ध्या में प्रसय होता है।
मार्गशीर्ष शुक्ल और पौष शुक्ल में स्थित गर्भ मन्द फल ( अल्प वृष्टि) देने वाला होता है।
यहाँ पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मास का ग्रहण करना चाहिये। जैसे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वैशाख कृष्ण अमान्त तक एक मास
एक मास, वैशाख शुक्ल प्रतिपदा से ज्येष्ठ कृष्ण अमान्त तक दूसरा मास इत्यादि।
शुक्ल में गर्भ हो तो भाद्र कृष्ण में, फाल्गुन कृष्ण में गर्भ हो तो आश्विन शुक्ल में, चैत्र शुक्त में गर्भ हो तो आश्विन कृष्ण में और चैत्र कृष्ण में गर्म हो तो कार्तिक शुल्क में प्रसव ( वृष्टि) होता है।
यदि गर्भकाल में मेध पूर्व दिशा में हो तो प्रसव काल में पश्चिम दिशा में, पश्चिम दिशा में हो तो पूर्व दिशा में, दक्षिण दिशा में हो तो उत्तर दिशा में, उत्तर दिशा में हो तो दक्षिण दिशा में, आग्नेय कोण में हो तो वायव्य कोण में, वायव्य कोण में हो तो आग्नेय कोण में, ईशान कोण में हो तो नैर्ऋत्य कोण में और गर्भकाल में नैऋध्ये कोण में मेघ हो तो प्रसव काल में ईशान कोण में मेघ होता है। इसी तरह वायु का भी दिग्वैपरीत्य समझना चाहिये। जैसे गर्भकाल में पूर्व तरफ की वायु हो तो प्रसव काल में पश्चिम तरफ की वायु होगी- इत्यादि समझना चाहिये ।
गर्भ-स्थितिकाल में आह्लादजनक, सुखस्पर्श और उत्तर, ईशान या पूर्व दिशा में उत्पन्न वायु, निर्मल आकाश, स्निग्ध श्वेत परिवेष से व्याप्त चन्द्र और सूर्य, आकाश
विस्तृत और स्निग्ध मेघ, सूच्याकार, क्षुराकार और लोहित मेघों, काक के अण्डे के समान, मयूर के कण्ठ के समान, निर्मल चन्द्र और नक्षत्रों से युत आकाश, इन्द्रधनु, मेघों के मधुर शब्द
विद्युत् और प्रतिसूर्य से युक्त पूर्वापरा सन्ध्या, सूर्य के अभिमुख होकर उत्तर, ईशान या पूर्व दिशा में स्थित पक्षी और मृग, नक्षत्रों के उत्तर मार्ग में होकर निर्मल उत्पातरहित ग्रहों का गमन,
नक्षत्रों के उत्तर मार्ग में होकर निर्मल उत्पातरहित ग्रहों का गमन, बाधारहित वृक्षों का अङ्कर, मनुष्य और पशु हर्षित - इन सब गुणों से युत गर्भ का समय हो तो गर्भ पुष्ट होता है।
मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से वैशाख के अन्त तक गर्भ की परीक्षा करनी चाहिये। गर्भ की वृद्धि के लिये ऋतु के स्वभाव से उत्पन्न अवशिष्ट लक्षणों को अब आगे कहता हूँ।
पौष और मार्गशीर्ष में दोनों, सन्ध्या रक्त और परिवेषयुत मेघ शुभ होता है तथा मार्गशीर्ष में अल्प शीत और पौष में हिम का गिरना शुभ होता है।
माघ मास में प्रबल भयङ्कर बायु, सूर्य और चन्द्र हिमयुक्त होकर मलिन कान्ति वाले, अति शीत और मेधरहित सूर्य का उदयास्त शुभ है।
फाल्गुन मास में रूक्ष और भयङ्कर वायु, मेषों का उदप, सूर्य और चन्द्र का निर्मल तया अखण्ड परिवेष, कपिल या ताम्र वर्ण का सूर्य शुभ है।
चैत्र मास में वायु, वृष्टि और परिवेषयुत गर्भ शुभ होता है। वैशाख मास में मेप, वायु, जल, विद्युत् और मेष के गर्ननयुत गर्भ शुभ होता है ।
मोती या चाँदी के समान श्वेत अथवा तमाल वृक्ष, नील कमल या अञ्जन के समान अति कृष्ण, अथवा जलचर जन्तु के समान कान्ति वाले गर्भकालिक नेप हों तो बहुत वृष्टि देने वाले होते हैं।
अति भयङ्कर सूर्यकिरण से तापित, अल्प वायु से युत गर्भकालिक मेघ १९५वें दिन (प्रसवकाल) में रुष्ट की तरह होकर धाराप्रवाह अतिवृष्टि करते हैं।
यदि गर्भकाल में उल्कापात, विद्युत्, धूलि की वृष्टि, दिशाओं में जलन, भूकम्प, गन्धर्व नगर, नाभस, कीलक आदि केतुओं का दर्शन ग्रहयुद्ध, निर्मात (शब्द), रुधिर आदि
(रुधिर, मांस, वसा, घृत, तैल आदि) की विकीरयुत वृष्टि, परिघ ( ४९वें अध्याय के १९ में श्लोक में वर्णित परिघ का लक्षण), इन्द्रधनु, राहु, चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण का दर्शन गर्भ का नाश करने वाले होते हैं।
ऋतुओं के स्वभावजनित ('पौपे समार्गशीर्षे सन्ध्यारागोऽम्बुदाः सपरिवेषाः' इत्यादि पयोक्त) और सामान्य ( 'हादिमृदूदविशवशक्रदिग्भवो मारुत' इत्यादि पद्योक्त) लक्षणों से युत गर्भ की वृद्धि; अन्यथा हानि होती है।
सभी ऋतुओं में पूर्वभाद्रपदा, उत्तरभाद्रपदा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाषाढ़ा, रोहिणी- इन पाँच नक्षत्रों में बढ़ा हुआ गर्भ प्रसवकाल में अधिक वृष्टि करता है।
शतभिषा, आश्लेषा, आर्दा, स्वाती या मघा नक्षत्र में उत्पन्न गर्भ बहुत दिन तक पुष्ट रहता है तथा उक्त पाँचों नक्षत्रों में बढ़े हुए गर्भ जितने दिन त्रिविध उत्पातों (दिव्य, आन्तरिक्ष और भीम) से हत हों, उतने दिन तक वर्षा नहीं होती है।
उक्त पाँच नक्षत्रों से किसी एक नक्षत्र में मार्गशीर्ष में गर्भ को वृद्धि हो तो प्रसवसमय से ८ दिन, पौष में ६ दिन, माँध में १६ दिन, फाल्गुन में २० दिन, चैत्र में २० दिन और वैशाख में ३ दिन तक वृष्टि होती है।
वक्ष्यमाण पाँच निमित्तों ( इसी अध्याय के सैतींसयें श्लोकोक्त निमित्तों) से युत गर्भ प्रसवकाल में सौ योजन तक बरसता है। चार निमित्तों से युत गर्भ पचास योजन तक, तीन निमित्तों से युत गर्भ पच्चीस योजन तक, दो निमित्तों से युत गर्भ साढ़े बारह योजन तक और एक निमित्त से युत गर्भ पाँच योजन तक प्रसवकाल में बरसता है।
पाँचों निमित्तों से युत गर्भ एक द्रोण बरसता है। वायु से युत गर्भ तीन आड़‌क, विद्युत् से युत गर्भ छ: आइ‌क, मेघों से युत गर्भ नी आदक और मेघों के गर्जन से युत गर्भ प्रसवकाल में बारह आइङ्क बरसता है ।
यदि गर्भकालिक नक्षत्र पापग्रह से युत हो तो उपल, वज्र और मछली से युत वृष्टि होती है। यदि वहाँ पर (गर्भकालिक नक्षत्र में) चन्द्र या रवि स्थित होकर शुभग्रह (बुध, बृहस्पति और शुक्र ) से युत या दृष्ट हो तो बहुत वर्षा देने वाला गर्भ होता है। गर्भनक्षत्रे क्रूरग्रहसंयुक्ते पापग्रहाधिष्ठिते गर्भाः करकाशनिमत्स्यवर्षदाः। करका उपलवृष्टिः, अशनिर्विद्युत्, मत्स्या मीनास्तैः संयुक्तं वर्ष ददति। शशिनि चन्द्रे रवावादित्ये वा तत्र स्थिते तस्मिंश्च शुभग्रहैर्बुधजीवशुक्राणामन्यतमेन चुक्ते ईक्षिते दृष्टे च। संयुतश्चासौ इंक्षितश्च तस्मिंस्तथाभूते भूरिवृष्टिकरा बहुवर्षदा गर्भाः ।
यदि गर्भसमय में निमित्तरहित अति वृष्टि हो तो गर्भ का नाश होता है तथा यदि पच्चीस पल या उससे अधिक वृष्टि हो तो गर्भस्राव हो जाता है।
पुष्ट गर्भ ग्रहोपघात आदि (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) कारणों से जलप्रद न हो तो आत्मीय गर्भ (फिर द्वितीय गर्भग्रहण) काल में उपलमिश्रित वृष्टि करता है।
जिस तरह बहुत समय तक रखा हुआ गौओं का दूध कठिन हो जाता है, उसी तरह बहुत समय बीतने पर जल भी कठिन होकर उपल के रूप में हो जाता है।
यदि वायु, जल, विद्युत्, मेघ का शब्द और मेघों से युत गर्भ हो तो प्रसवकाल में बहुत वृष्टिप्रद होता है। इस तरह के गर्भसमय में यदि बहुत वृष्टि हो तो प्रसवकाल में अधिक वृष्टि नहीं होती ।
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