देवविदविहितचिन्नो युनिशं यो गर्भलक्षणे भवति । तस्य मुनेरिव वाणी न भवति मिथ्याम्बुनिर्देशे ॥
जो देवज्ञ रात-दिन गर्भलक्षण में अविक्षिपा चित होकर लगे रहते है, मुनि को तरह
उन्नते माणो तुहि-ज्ञान में निया नहीं होती है।
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