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बृहत्संहिता • अध्याय 21 • श्लोक 13
पूर्वोद्भूताः पश्चादपरोत्याः प्राग्भवन्ति जीमूताः । शेषास्वपि दिश्वेवं विपर्ययो भवति वायोश्च ॥
यदि गर्भकाल में मेध पूर्व दिशा में हो तो प्रसव काल में पश्चिम दिशा में, पश्चिम दिशा में हो तो पूर्व दिशा में, दक्षिण दिशा में हो तो उत्तर दिशा में, उत्तर दिशा में हो तो दक्षिण दिशा में, आग्नेय कोण में हो तो वायव्य कोण में, वायव्य कोण में हो तो आग्नेय कोण में, ईशान कोण में हो तो नैर्ऋत्य कोण में और गर्भकाल में नैऋध्ये कोण में मेघ हो तो प्रसव काल में ईशान कोण में मेघ होता है। इसी तरह वायु का भी दिग्वैपरीत्य समझना चाहिये। जैसे गर्भकाल में पूर्व तरफ की वायु हो तो प्रसव काल में पश्चिम तरफ की वायु होगी- इत्यादि समझना चाहिये ।
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