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अध्याय 8 — नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार:

सूर्य सिद्धांत
21 श्लोक • केवल अनुवाद
(उत्तराषाढ़ा अभिजित्‌ श्रवण और धनिष्ठा को छोड़कर शेष) अश्विन्यादि नक्षत्रों की वक्ष्य्माण भोगकलाओं को १० से गुणाकर अश्वन्यादि गत नक्षत्रों की भोग कलाओं को जोड़ने से अश्वन्यादि नक्षत्रों के ध्रुव होते हैं।
अश्विनी नक्षत्र की भोगकला ४८ को दश से गुणा किया तो ४८० हुए,
गत नक्षत्र का अभाव होने के कारण अश्विनी का यही कलात्मक ध्रुव ४८० हुआ।
भरणी की भोगकला ४० को १० से गुणाकर ४०० एक गत नक्षत्र की (भभोगोष्ष्टशतीलिप्ता द्वारा) भोगकलछा ८०० जोड़ने से भरणी नक्षत्र का ध्रुव १२०० हुआ।
इसी प्रकार सम्पूर्ण नक्षत्रों की धुवकला साधन कर ऊपर दी गई हैं। यहाँ भगवान्‌ सूर्य ने पाठ में लाघव के लिए सब नक्षत्रों की भोगकला ही पढ़ी हैं।
अपने-अपने ध्रुव स्थानों से अपनी-अपनी योगताराएँ जितनी-जितनी कलाओं के अन्तर से स्थित हैं वे अपनी-अपनी भोगंकलाएँ होती हैं,
परन्तु यहाँ भगवान्‌ सूर्य ने लाघव के लिए भोगकलाओं में बीस का अपवर्तन दे कर लिखा है।
उत्तराषाढा अभिज़्ित्‌ श्रवण और धनिष्ठा नक्षत्र की योगतारा अपने भोगस्थान से पश्चिम में स्थित होने के कारण
उक्त रीति से उनके ध्रुव नहीं आते इसलिए भिन्‍न रीति से इनके ध्रुव कहे गये हैं।
अगस्त्य का भ्रुवक ३ राशि और दक्षिण शर ८० अंश है। लुब्धक का भ्रुवक ८० अंश और दक्षिण शर ४० अंश है।
अग्नि का ध्रुवक ५२ अंश और उत्तर शर ८ अंश है। ब्रह्महदय का ध्रुवक ५२ अंश और उत्तर शर ३० अंश है।
इन अश्विनी आदि नक्षत्रों के तथा अगस्त्य आदि ताराओं के ध्रुवक और शरों की गोल रचना कर गणक वेध द्वारा इनकी परीक्षा करे, क्योंकि यह पाठ पठित श्रुवक और शर, ग्रन्थ निर्माण काल के हैं। कालान्तर में वेधोपलब्ध लेने चाहिए।
वृषरशशि के १७ अंश में स्थित जिस ग्रह का दक्षिण शर दो अंश से अधिक होता है वह (ग्रह) रोहिणी शकट का भेदन करता है।
जिस प्रकार ग्रहों का दिनमान, रात्रिमान साधन किया गया है उसी प्रकार नक्षत्रों का भी दिनमान और रात्रिमान साधन करना चाहिए। अनन्तर आक्षदृक्कर्म का साधन कर नक्षत्रों के श्रुवक में इसका संस्कार कर ग्रहयुति साधन की तरह नक्षत्रग्रहयुतिकाल का साधन करना चाहिए। ग्रह नक्षत्र की युति के दिनों का साधन केवल ग्रहगति से ही करना चाहिए।
आयजनदृक्कर्म संस्कृतग्रह, आतशक्षदृक्र्म संस्कृत नक्षत्र ध्रुव से हीन हो तो गम्य और अधिक हो तो गत योग होता है। वक्रगति ग्रह का इससे विलोम अर्थात्‌ नक्षत्रभ्रुव से ग्रह अधिक हो तो गम्य और न्यून हो तो गत योग होता हैं।
पूर्वाफाल्गुनि, उत्तराफाल्गुनि, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, विशाखा, अश्विनी और मृगशिरा इनके तारापुज्जों में उत्तरदिशा स्थित तारों को योग तारा कहते हैं।
पञ्चतारात्मक हस्तनक्षत्र के पश्चिमोत्तर में स्थित पश्चिमतारा से उत्तर दिशा में स्थित जो तारा, उससे दूसरी पश्चिम तारा अर्थात्‌ वायव्यदिशा में स्थित तारा योगतारा है।
धनिष्ठा नक्षत्र की पश्चिम दिशा में स्थित तारा योगतारा है। ज्येष्ठा, श्रवण, अनुराधा और पुष्य इनकी मध्यतारा योगतारा है। भरणी, कृत्तिका, मघा और रेवती इनकी दक्षिण दिशा में स्थित तारा योगतारा है।
रोहिणी, पुनर्वसु, मूल और आश्लेषा इनके पूर्व दिशा में स्थित तारा योगतारा है। शेष नक्षत्रों की स्थूल अर्थात्‌ बड़ी और कान्तिमती (प्रकाशमान) त्मरा योग तारा कही जाती है।
ब्रह्चतदय से ५ अंश पूर्व वृषान्त के निकट अपने क्रान्त्यग्र से ३८ अंश उत्तर की दिशा में तारात्मक ब्रह्मा की स्थिति है। अर्थात्‌ ब्रह्मा का ध्रुवक १ राशि २७ अंश तथा उत्तर शर ३८ अंश है।
चित्रा नक्षत्र से ५ अंश उत्तर की ओर अपांवत्स की तारा है। अर्थात्‌ अपांवत्स का भ्रुवक ६ राशि और अपने क्रान्त्यग्र से ३ अंश उत्तर शर है। अपांवत्स से कुछ दूरी पर स्थूलतारात्मक आपसंज्ञक ६ अंश उत्तर दिशा में स्थित है। अर्थात्‌ आप संज्ञक तारा का ध्रुवक १८० अंश और उत्तर शर ६ अंश है।
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