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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 8 • श्लोक 4
मनवोज्थ रसा वेदा वैश्वमाप्यार्धभोगगम्‌ । आप्यस्यैवाभिजित प्रान्ते वैश्वान्ते श्रवणस्थिति: ॥
भरणी की भोगकला ४० को १० से गुणाकर ४०० एक गत नक्षत्र की (भभोगोष्ष्टशतीलिप्ता द्वारा) भोगकलछा ८०० जोड़ने से भरणी नक्षत्र का ध्रुव १२०० हुआ।
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