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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 8 • श्लोक 14
ग्रहनक्षत्रयोयुति साधनम्‌ ग्रहवद्‌ द्युनिशे भानां कुर्याद्‌ दृक्‍्कर्म पूर्ववत्‌ । ग्रहमेलकवच्छेष॑ ग्रहंभुक्त्या दिनानि च ॥
जिस प्रकार ग्रहों का दिनमान, रात्रिमान साधन किया गया है उसी प्रकार नक्षत्रों का भी दिनमान और रात्रिमान साधन करना चाहिए। अनन्तर आक्षदृक्कर्म का साधन कर नक्षत्रों के श्रुवक में इसका संस्कार कर ग्रहयुति साधन की तरह नक्षत्रग्रहयुतिकाल का साधन करना चाहिए। ग्रह नक्षत्र की युति के दिनों का साधन केवल ग्रहगति से ही करना चाहिए।
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