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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 8 • श्लोक 3
कृतेषवोी युगरसा: शून्यबाणा वियद्रसा: । खवेदा: सागरनगा गजागा: सागरतव:॥
गत नक्षत्र का अभाव होने के कारण अश्विनी का यही कलात्मक ध्रुव ४८० हुआ।
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