इन अश्विनी आदि नक्षत्रों के तथा अगस्त्य आदि ताराओं के ध्रुवक और शरों की गोल रचना कर गणक वेध द्वारा इनकी परीक्षा करे, क्योंकि यह पाठ पठित श्रुवक और शर, ग्रन्थ निर्माण काल के हैं। कालान्तर में वेधोपलब्ध लेने चाहिए।
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