मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 5 — पञ्चमोध्यायः

श्वेताश्वतर
14 श्लोक • केवल अनुवाद
वेदों मे वर्णित 'ब्रह्म' से भी परे जो 'परात्पर' तत्त्व है, उसी 'अक्षर' एवं 'अनन्त' में 'विद्या' तथा 'अविद्या' दोनों गूढ रूप से निहित हैं। किन्तु इनमें से अविद्या क्षर है, विनाशशीला है और विद्या अमृतस्वरूपा है; और 'वह' (परात्पर तत्त्व) जो इन दोनों का ईश है, वह इन दोनों से अन्य (भिन्न) है।
'वह' जो 'एकमेव' है, भिन्न-भिन्न योनियों में (गर्भों में), अनेकानेक रूपों में तथा समस्त प्राणियों के गर्भ में प्रवेश करता है। 'उसी' ने आरम्भ में माँ के गर्भ में स्थित कपिल ऋषि को विविध ज्ञान से परिपूरित किया; 'उसी' ने कपिल को जन्म लेते हुए देखा।
यह 'देव' स्वयं ही कभी एक जाल बुनता है तथा कभी दूसरा तथा उससे ही बहुविध जाल रचकर इस शरीर रूपी क्षेत्र में फैला देता है; पुनः 'वह' इस सबका अपने अन्दर संहरण कर लेता है। और 'उसी' ने अनेक यतियों, महान् ऋषियों को रचा, इस प्रकार वह 'ईश', वह महात्मा अपने विश्वेश्वर स्वरूप से सब पर आधिपत्य (शासन) करता है।
'सूर्य' जब उदित होता है तथा जगत् रूपी शकट को चलाता है, तब यह समस्त दिशाओं को, ऊर्ध्व, अधः तथा सीधी-तिरछी सभी समतल दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान् होता है। इसी प्रकार वह तेजस्वी एवं देदीप्यमान् 'ईश्वर', 'एकमेव' होते हुए भी प्रत्येक योनि में प्रवेश करके उस योनि के स्वभाव के अनुसार उस पर शासन करता है।
क्योंकि 'वह' जो इस 'विश्व' की 'योनि' (उद्गम स्थल) है, वह प्रत्येक स्वभाव को उसकी पूर्णता में पहुँचाता है तथा जो अभी भी परिपूर्ण होने बाकी हैं उन सबको परिपूर्ण बनाता है। 'वह' 'एकमेव' 'अपने' इस विश्व का अधिष्ठातृस्वरूप है, 'वह' इसमें निवास करता है तथा 'प्रकृति' के समस्त गुणों को उनकी क्रियाओं में नियोजित करता है।
यह वह गूढ रहस्य है जो उपनिषदों में निहित है; क्योंकि उपनिषद् वेद का ही रहस्य हैं। 'यह' वही है जिसे ब्रह्मा 'ब्रह्म-योनि'- शाश्वततत्व के गर्भ के रूप में जानते हैं तथा जिन पूर्व देवगणों एवं ऋषियों ने 'इसे' जान लिया वे 'इस' के साथ तद्रूप (तन्मय) होकर अमर हो गये।
एक 'वह' है जो कर्मों के फलों को बनाने वाला है, क्योंकि 'वह' प्रकृति के गुणों से संयुक्त है; 'वह' ही कृत-कर्मों का भोग करता है; यह 'विश्व' 'उसी' का शरीर है तथा 'उसकी' प्रकृति त्रिगुणात्मिका है एवं 'उसकी' यात्रा के भी इसी प्रकार तीन पथ हैं। अहो, यह 'प्राणों का अधिपति', 'अपने' ही कर्मों की गति के द्वारा युग-युगान्तर में संचरण करता है।
'उसका' आकार मनुष्य के अंगूठे के बराबर है किन्तु उसका रूप देदीप्यमान् 'सूर्य' के समान है, वह 'संकल्प-शक्ति' एवं 'अहंकार'-'व्यक्तित्व' से सम्पन्न है; किन्तु एक अन्य है जिसका हम 'बुद्धि' के गुणों के द्वारा तथा 'आत्मा' के गुणों के द्वारा साक्षात्कार करते हैं क्योंकि वह 'अन्य' दृष्टि के लिए मोची की सुतारी (सूई) की नोक से भी अधिक सूक्ष्म है।
यदि तुम 'उसे' पृथक् करना चाहो तो एक बाल के अग्रभाग के भी शतांश को लेकर उसको भी शतधा विभक्त करो; तब इस शतांश का भी जो शतांश है, ऐसा है मनुष्य में यह 'आत्मा'; तो भी यही है तुम्हारे अन्दर जो 'अनन्तता' की ओर जाने में समर्थ होता है।
न 'यह' स्त्री है न ही पुरुष, न ही यह नपुंसक है; यह जो भी शरीर धारण करता है, वही 'उसे' अपने अन्दर सुरक्षित एवं आबद्ध रखता है।
जिस प्रकार शरीर का अन्न, जल एवं प्रचुर वर्षण से जन्म तथा संवर्धन होता है, उसी प्रकार 'आत्मा' इस शरीर में दृष्टि के आकर्षण, स्पर्श की मोहिनी, संकल्प के जादू से क्रमशः अपने उचित स्थानों पर उत्तरोत्तर रूपों कों धारण करता है, क्योंकि अपने कर्मों के अनुसार वह प्रगति करता है तथा उसके रूपों का निर्धारण उसके कर्मों के अनुसार होता है।
देह में स्थित 'आत्मा' (देहि) सूक्ष्म, स्थूल तथा अन्य अनेक रूप कर्म में अपने स्वभाव के द्वारा विकसित करता है; अपने कार्यों के कर्मविधान तथा मनुष्य में 'आत्मा' के कर्मविधान के द्वारा वह इन्हें विकसित करता है। किन्तु एक 'अन्य' भी है 'जिसे' हम 'संयोगहेतु' (कारण) के रूप में देखते हैं जिसमें ये सब एक साथ मिल जाते है।
इस अस्तव्यस्तता एवं अव्यवस्थित प्रपंच (कलिल) के बीच उस 'अनादि' एवं 'अनन्त' को, जो अनेक रूप धारण करके इस विश्व की रचना करता है, तथा 'एकमेव' होते हुए भी उसे परिवेष्टित कर लेता है, उस 'देव' (ईश्वर) को जो जान लेता है, वह व्यक्ति समस्त पाशों से (बन्धनों से) मुक्त हो जाता है।
'शिव', जो समस्त सम्भूतियों (भाव) तथा असम्भूतियों (अ-भाव) के 'स्वामी' हैं, जिनसे यह समस्त सृष्टि प्रवाहित होती है, और यह सब कुछ 'शिव' का केवल एक अंश है; परन्तु वे 'अनीड्य' कहे जाते हैं अर्थात् मुक्त 'आत्मा' के किसी आश्रय के नाम से नहीं जाने जाते, जो केवल हृदय के भावों के द्वारा ही ग्राह्य हैं, ऐसे मंगलमय 'शिव' को जो जानते हैं, वे सदा के लिए देह का त्याग कर देते हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें