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श्वेताश्वतर • अध्याय 5 • श्लोक 13
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्ठारमनेकरूपम्‌। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥
इस अस्तव्यस्तता एवं अव्यवस्थित प्रपंच (कलिल) के बीच उस 'अनादि' एवं 'अनन्त' को, जो अनेक रूप धारण करके इस विश्व की रचना करता है, तथा 'एकमेव' होते हुए भी उसे परिवेष्टित कर लेता है, उस 'देव' (ईश्वर) को जो जान लेता है, वह व्यक्ति समस्त पाशों से (बन्धनों से) मुक्त हो जाता है।
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