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श्वेताश्वतर • अध्याय 5 • श्लोक 11
सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर्ग्रासांबुवृष्ट्या चत्मविवृद्धिजन्म। कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसम्प्रपद्यते॥
जिस प्रकार शरीर का अन्न, जल एवं प्रचुर वर्षण से जन्म तथा संवर्धन होता है, उसी प्रकार 'आत्मा' इस शरीर में दृष्टि के आकर्षण, स्पर्श की मोहिनी, संकल्प के जादू से क्रमशः अपने उचित स्थानों पर उत्तरोत्तर रूपों कों धारण करता है, क्योंकि अपने कर्मों के अनुसार वह प्रगति करता है तथा उसके रूपों का निर्धारण उसके कर्मों के अनुसार होता है।
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