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श्वेताश्वतर • अध्याय 5 • श्लोक 3
एकैक जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः। भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा॥
यह 'देव' स्वयं ही कभी एक जाल बुनता है तथा कभी दूसरा तथा उससे ही बहुविध जाल रचकर इस शरीर रूपी क्षेत्र में फैला देता है; पुनः 'वह' इस सबका अपने अन्दर संहरण कर लेता है। और 'उसी' ने अनेक यतियों, महान् ऋषियों को रचा, इस प्रकार वह 'ईश', वह महात्मा अपने विश्वेश्वर स्वरूप से सब पर आधिपत्य (शासन) करता है।
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