मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
श्वेताश्वतर • अध्याय 5 • श्लोक 7
गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता। स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्मा प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः॥
एक 'वह' है जो कर्मों के फलों को बनाने वाला है, क्योंकि 'वह' प्रकृति के गुणों से संयुक्त है; 'वह' ही कृत-कर्मों का भोग करता है; यह 'विश्व' 'उसी' का शरीर है तथा 'उसकी' प्रकृति त्रिगुणात्मिका है एवं 'उसकी' यात्रा के भी इसी प्रकार तीन पथ हैं। अहो, यह 'प्राणों का अधिपति', 'अपने' ही कर्मों की गति के द्वारा युग-युगान्तर में संचरण करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
श्वेताश्वतर के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

श्वेताश्वतर के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें