बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते॥
यदि तुम 'उसे' पृथक् करना चाहो तो एक बाल के अग्रभाग के भी शतांश को लेकर उसको भी शतधा विभक्त करो; तब इस शतांश का भी जो शतांश है, ऐसा है मनुष्य में यह 'आत्मा'; तो भी यही है तुम्हारे अन्दर जो 'अनन्तता' की ओर जाने में समर्थ होता है।
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