वेदों मे वर्णित 'ब्रह्म' से भी परे जो 'परात्पर' तत्त्व है, उसी 'अक्षर' एवं 'अनन्त' में 'विद्या' तथा 'अविद्या' दोनों गूढ रूप से निहित हैं। किन्तु इनमें से अविद्या क्षर है, विनाशशीला है और विद्या अमृतस्वरूपा है; और 'वह' (परात्पर तत्त्व) जो इन दोनों का ईश है, वह इन दोनों से अन्य (भिन्न) है।
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