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श्वेताश्वतर • अध्याय 5 • श्लोक 1
द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे। क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः॥
वेदों मे वर्णित 'ब्रह्म' से भी परे जो 'परात्पर' तत्त्व है, उसी 'अक्षर' एवं 'अनन्त' में 'विद्या' तथा 'अविद्या' दोनों गूढ रूप से निहित हैं। किन्तु इनमें से अविद्या क्षर है, विनाशशीला है और विद्या अमृतस्वरूपा है; और 'वह' (परात्पर तत्त्व) जो इन दोनों का ईश है, वह इन दोनों से अन्य (भिन्न) है।
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