सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्प्रकाशयन्भ्राजते यद्वनड्वान्।
एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः॥
'सूर्य' जब उदित होता है तथा जगत् रूपी शकट को चलाता है, तब यह समस्त दिशाओं को, ऊर्ध्व, अधः तथा सीधी-तिरछी सभी समतल दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान् होता है। इसी प्रकार वह तेजस्वी एवं देदीप्यमान् 'ईश्वर', 'एकमेव' होते हुए भी प्रत्येक योनि में प्रवेश करके उस योनि के स्वभाव के अनुसार उस पर शासन करता है।
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