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श्वेताश्वतर • अध्याय 5 • श्लोक 12
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति। क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः॥
देह में स्थित 'आत्मा' (देहि) सूक्ष्म, स्थूल तथा अन्य अनेक रूप कर्म में अपने स्वभाव के द्वारा विकसित करता है; अपने कार्यों के कर्मविधान तथा मनुष्य में 'आत्मा' के कर्मविधान के द्वारा वह इन्हें विकसित करता है। किन्तु एक 'अन्य' भी है 'जिसे' हम 'संयोगहेतु' (कारण) के रूप में देखते हैं जिसमें ये सब एक साथ मिल जाते है।
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