Krishjan
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अध्याय 3 — तृतीयोऽध्यायः
श्वेताश्वतर
21 श्लोक • केवल अनुवाद
जगत के सृजन और प्रलय के समय वही अकेला अभिन्न एकं विद्यमान रहता है। वह अपनी अबोधगम्य माया की शक्तियों का स्वामी होने के कारण परम प्रभु है। वही सभी जगतों की रक्षा करता है ओर उनमें कार्यरत बहुविध शक्तियों का नियन्त्रण करता है । जो इस परम सत्ता को सिद्ध कर लेता है वह मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है।
जो जगतों की रक्षा तथा उन पर शासन करता है वह, रुद्र, वास्तव में केवल एक ही है। उसके समीप कोई नहीं है जो उसे दूसरा बना सके। वह सभी प्राणियों के हृदय में विद्यमान है। सभी जगतों का सृजन और पालन करने के बाद अन्त में वह अपने आप में इसे निवर्तित कर लेता है।
यद्यपि ईश्वर द्युलोक और पृथ्वी दोनों का सृजनकर्ता है, फिर भी, इस जगत में द्युलोक ही सभी नेत्रों, मुखों, हस्तों, पादों का सच्चा स्वामी है। द्युलोक ही उन्हें भिन्न-भिन्न प्राणियों के ज्ञान, पूर्व कर्मों तथा प्रवृत्तियों के अनुसार (जिनके साथ वे जुड़े हुए प्रतीत होते हैं) अपने-अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।
वे परमदेव जिन्होंने देवों को जन्म दिया और उन्हें आश्रय दिया, वे जो विश्वात्मा का मूल भी है, जो भक्तों के पापों और दुःखों का नाश कर और अधर्म करने वालों को दण्ड देकर भक्तों पर आनन्द और ज्ञान की वर्षा करता है, जो महर्षि और प्रभु है, जिसने हिरण्यगर्भ को प्रकट किया, वे हमें शुभ विचार प्रदान करें।
हे प्रभु! वेदों को प्रकाशित कर तू सभी प्राणियों पर कृपा की वर्षा करता है, अपने शान्त और आनन्दमय रूप द्वारा हम सब को प्रसन्न रखने का अनुग्रह करता है जिससे भय और पाप दोनों नष्ट हो जाते हैं।
हे वैदिक सत्यों के रहस्योद়घाटनकर्ता, उस बाण को मंगलमय बनाने की कृपा कर जो तूने किसी पर लक्ष्य साधने के लिए अपने हाथ में रखा है। हे भक्तों के रक्षक, अपने सौम्य व्यक्तिगत रूप को नष्ट न कर जो विश्व के रूप में अभिव्यक्त है।
इस व्यक्तिगत ब्रह्म से उच्चतर है अनन्त परम ब्रह्म जो सभी सत्ताओं में उनके रूपों के अनुसार छिपे हुए हैं तथा जो एकल हैं फिर भी समस्त ब्रह्माण्ड को आवृत किये हुए हैं। जो उनको परमेश्वर के रूप में जान जाता है वह अमृत बन जाता है।
मैं उस परम पुरुष को जान गया हूँ जो सूर्य के समान देदीप्यमान है और समस्त अन्धकार से परे है। जो उसे अनुभूति द्वारा जान जाता है वह मृत्यु से मुक्त हो जाता है। जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा का कोई अन्य मार्ग नहीं है।
उससे उच्चतर अथवा उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। उससे महानतर अथवा सूक्ष्मतर कुछ भी नहीं है। अपनी महिमा में मूलबद्ध वह एकमेवाद्वितीय और अटल होकर एक वृक्ष के समान खड़ा है। उस पुरुष के द्वारा समस्त ब्रह्माण्ड परिपूरित है।
वह पुरुष इस विश्व से अत्यन्त परे है, अरूप है, और दुःख से रहित है। जो इसे अनुभव द्वारा जान जाते हैं वे मृत्यु से मुक्त हो जाते हैं। किन्तु अन्य सब को निःसन्देह दुःख भोगना पड़ता है।
इसलिए वह परमेश्वर सर्वव्यापी और सर्वकल्याणकारी होने के कारण सभी प्राणियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं और विश्व के सभी लोगों के मुखों, सिरों तथा ग्रीवाओं का उपयोग करते हैं।
यह आत्मन वास्तव में शक्तिशाली प्रभु है। वह अव्यय प्रकाश है जो हर चीज का नियन्ता है। वह सभी प्राणियों की बुद्धि का मार्गदर्शन करता है जिससे वे शुद्धतम स्थिति यानी मुक्ति की स्थिति को प्राप्त कर सकें।
अनन्त पुरुष अंगुष्ठमात्र आकार में बुद्धि, भावना, कल्पना तथा संकल्प के द्वारा सभी प्राणियों के हृदय में उनकी अन्तरात्मा के रूप में निवास करता है। जो इस सत्य को अनुभव कर लेते हैं वे अमृतत्व प्राप्त कर लेते हैं।
उस सनातन पुरुष के सहस्र शीर्ष हैं, सहस्र नेत्र हैं तथा सहस्र चरण हैं और वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को सभी दिशाओं से आवृत करता हुआ उससे दस अंगुल ऊपर स्थित है।
वर्तमान में जो कुछ है, अतीत में जो कुछ था और भविष्य में जो होनेवाला है — यह सब केवल अनन्त पुरुष ही है। यद्यपि वह अपनी प्रकृति से अलग वस्तुपरक विश्व का रूप धारण करता है, फिर भी वह अमृतत्व का प्रभु ही रहता है।
उसके हाथ और पांव सर्वत्र हैं, उसके नेत्र, सिर, कान तथा मुख सब स्थान पर हैं। वह ब्रह्माण्ड में हर वस्तु में व्याप्त होकर सर्वत्र विद्यमान रहता है।
सभी इन्द्रियों के कार्यों से वह प्रकाशमान है, फिर भी इन्द्रियों के बिना वह सब का प्रभु, शासक, सबका आश्रय और मित्र है।
नवद्वार की पुरी में उसी हंस या आत्मा का निवास है। वह आत्मा के रूप में बाह्य जगत में लीला करता है। वह सम्पूर्ण विश्व, समस्त चर-अचर जगत का विधाता है।
वह बिना हाथ का होते हुए सबको पकड़े हुए है। बिना पांव के वह तेजी से चलता है। नेत्र के बिना देखता है। कान के बिना सुनता है। जानने योग्य हर चीज को वह जान लेता है। पर उसे कोई नहीं जानता। ज्ञानीजन कहते हैं कि वह अग्रवर्ती और विराट पुरुष है।
सूक्ष्मतम से भी सूक्ष्मतर तथा महानतम से भी महानतर आत्मन प्राणियों के हृदय में छिप गया है। विधाता की कृपा से व्यक्ति शोक और कामना से मुक्त होकर उसे परमात्मन के रूप में जान लेता है।
मैं इस अजर, आदियुगीन, सर्वव्यापी, सब के आत्मन् को जानता हूँ जो विभु और सर्वव्यापक है, और जिसे ब्रह्मवेता सनातन रूप से जन्म-मरण से मुक्त बताते हैं।
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