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श्वेताश्वतर • अध्याय 3 • श्लोक 9
यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्‌। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्‌॥
उससे उच्चतर अथवा उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। उससे महानतर अथवा सूक्ष्मतर कुछ भी नहीं है। अपनी महिमा में मूलबद्ध वह एकमेवाद्वितीय और अटल होकर एक वृक्ष के समान खड़ा है। उस पुरुष के द्वारा समस्त ब्रह्माण्ड परिपूरित है।
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