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श्वेताश्वतर • अध्याय 3 • श्लोक 16
सर्वतःपाणिपादं तत्‌ सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌। सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
उसके हाथ और पांव सर्वत्र हैं, उसके नेत्र, सिर, कान तथा मुख सब स्थान पर हैं। वह ब्रह्माण्ड में हर वस्तु में व्याप्त होकर सर्वत्र विद्यमान रहता है।
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