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श्वेताश्वतर • अध्याय 3 • श्लोक 18
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥
नवद्वार की पुरी में उसी हंस या आत्मा का निवास है। वह आत्मा के रूप में बाह्य जगत में लीला करता है। वह सम्पूर्ण विश्व, समस्त चर-अचर जगत का विधाता है।
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